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HEALTH TIPS

Sunday, May 3, 2015

थाली में दाल-रोटी की जगह लेंगे कीड़े

आप शुद्ध शाकाहारी हैं? अगर हां, तो आपके लिए एक बुरी खबर है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने आगाह किया है कि विश्व की आबादी आठ अरब के आसपास पहुंचने की वजह से इतनी बड़ी आबादी का पेट अब सिर्फ शाकाहार से भरना मुश्किल होगा। ऐसे में जल्द लोगों के पास कीड़े-मकोड़े खाने के अलावा कोई दूजा विकल्प नहीं बचेगा।
एफएओ ने हाल में `एडिबल इनसेक्ट्स: फ्यूचर प्रोसपेक्ट्स फॉर फूड एंड फीड सिक्योरिटी` शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इस रिपोर्ट में स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिहाज से लाभकारी माने जाने वाले ऐसे कीटों की सूची बनाई गई है जिन्हें आप पूरक आहार के रूप में ले सकते हैं। ये कीड़े-मकोड़े भविष्य में कैसे आपकी भूख मिटा सकते हैं?
`मोपेन` नामक इल्ली या सूंडियां ऐसे कीटों में शामिल हैं। इन्हें खाने से पूर्व नमकीन पानी में उबाला और धूप में सुखाया जाता है। इन्हें बिना रेफ्रिजरेटर भी कुछ माह तक सुरक्षित रखा जा सकता है। एफएओ के मुताबिक, इल्लियां पोटेशियम, सोडियम, कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम, जिंक, मैगनीज और कॉपर का एक अच्छा स्रोत हैं।
पोषणयुक्त अन्य कीटों में दीमक भी शामिल हैं। इन्हें तलकर, धूप में सुखाकर, भूनकर या केले के पत्तों पर रखकर भांप लगाकर खाया जा सकता है। आमतौर पर दीमक में 38 प्रतिशत तक प्रोटीन होता है। टिड्डे भी बड़े पैमाने पर खाए जाते हैं। इन्हें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन देने के लिए जाना जाता है। बदबूदार कीड़े पूरे एशिया, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका में खाए जाते हैं। खाने से पूर्व इन्हें भूना या पानी में भिगोकर धूप में सुखाया जाता है। ये कीड़े-मकोड़े प्रोटीन, आयरन, पोटेशियम और फास्फोरस सहित कुछ अन्य महत्वपूर्ण पोषक तत्वों से समृद्ध होते हैं।

नारियल से ब्लड ग्रुप की जानकारी सिर्फ 10 सेकेंड में!

छत्तीसगढ़ के रायपुर में कृषि विभाग में कार्यरत बी. डी गुहा ने आश्चर्यजनक रूप से नारियल से ब्लड ग्रुप पहचानने की तकनीक ईजाद की है। गुहा किसी भी व्यक्ति को बिना छुए महज 10 सेकेंड में ब्लड ग्रुप बता देते हैं। आमतौर पर नारियल सिर्फ मंदिरों में फोड़ने के काम आता है लेकिन कोई कहे कि यह आपका ब्लड ग्रुप बता सकता है तो सहसा विश्वास नहीं होता। गुहा का दावा है कि वह इससे भरा और खाली सिलेंडर, जमीन के अंदर का पानी, भूमिगत सुरंगों की भी पहचान कर सकते हैं। विभिन्न ब्लड ग्रुप में नारियल अलग-अलग दिशा में क्यों मुड़ता है, इसका वैज्ञानिक कारण जानने के लिए वह अब शोध कर रहे हैं।
चिकित्सा विज्ञान के मुताबिक 8 ब्लड ग्रुप ए पॉजीटिव, ए निगेटिव, एबी पॉजीटिव, एबी निगेटिव, बी पॉजीटिव, बी निगेटिव, ओ पॉजीटिव और ओ निगेटिव होते हैं।
गुहा बताते हैं कि इनमें से 5 ब्लड ग्रुप. ए पॉजीटिव, एबी पॉजीटिव, बी पॉजीटिव, ओ पॉजीटिव और ओ निगेटिव को वह नारियल से पहचान सकते हैं। बाकी तीन को लेकर भी शोध हो रहा है। चूंकि ये तीनों ब्लड ग्रुप वाले लोगों की संख्या बहुत कम हैं, इसलिए इन्हें पहचानने में समय लग रहा है।
आखिर अलग-अलग ब्लड ग्रुप में नारियल अलग दिशा में क्यों मुड़ जाता है, इसका वैज्ञानिक कारण गुहा खुद नहीं जानते। गुहा इसे पता लगाने के लिए अब शोध कर रहे हैं। इस काम में उनकी मदद कर रही हैं उनकी बेटी सोनाली, मोनाली और बेटा आयुष।
कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग कर रहे उनके तीनों बच्चों को जल्द ही इससे संबंधित वैज्ञानिक कारण पता लगने की उम्मीद है। पत्नी मीनाक्षी भी अब इस कला में विशेषज्ञ हो चुकी हैं।
गुहा बताते हैं कि किसी भी व्यक्ति के सिर से थोड़ा ऊपर हथेली में नारियल लें। थोड़ी देर में नारियल अलग दिशा में मुड़ जाता है। जिस जगह भूमिगत पानी, या जल आपूर्ति की पाइपलाइन हो, वहां नारियल सही नतीजे नहीं बताता।
ए पॉजीटिव ब्लड ग्रुप होने पर नारियल 45 डिग्री की पोजिशन लेता है। एबी पॉजीटिव में 45 से 55 डिग्री, बी पॉजीटिव में 60 डिग्री, ओ पॉजीटिव में 90 और ओ नेगेटिव में 180 डिग्री की पोजीशन ले लेता है।
गुहा ने बताया कि साल 2005 में बलौदाबाजार के एक स्कूल में पानी के अच्छे स्रोत का पता लगाने के लिए मुझे बुलाया गया था। वहां के बच्चे बहुत शरारत कर रहे थे, उन्हें शांत कराने के लिए मैंने उनसे कहा कि तुम सब एक लाइन में खड़े हो जाओ, मैं जांचूंगा कि तुममें पानी है या नहीं।
मजाक-मजाक में किए गए इस परीक्षण के दौरान मैंने देखा कि कुछ बच्चों के सिर से थोड़ा ऊपर हथेली पर रखा नारियल 90 डिग्री में खड़ा हो गया। मैंने यही प्रयोग घर आकर अपने बच्चों पर किया। फिर, वही हुआ। लैब में बच्चों का ब्लड ग्रुप चेक कराया तो वो ओ पॉजीटिव निकला। बस यहीं से मेरा ये सफर शुरू हो गया। बहरहाल राजधानी का यह गुहा परिवार शोध के बाद कुछ और नई जानकारियां सामने लाने में जुटा हुआ है।

मां का दूध पीने वाले बच्चे पढ़ाई में अच्छे

जो बच्चे मां का दूध पीते हैं, वे ज्यादा तेज दिमाग होते हैं। मां के दूध में कोई ऐसा छुपा गुण होता है, जिससे बच्चे कुशाग्र हो जाते हैं। मां का दूध बच्चे के लिए सबसे पौष्टिक भोजन होता है यह बात तो हमें पता है लेकिन मां के दूध में छुपे गुणों के कारण उनके कुशाग्र होने की बात एक ताजातरीन अध्ययन में कही गई है। अध्ययन के मुताबिक ऐसे बच्चे स्कूल में आमतौर पर दूसरों की तुलना में अच्छा प्रदर्शन करते हैं।
अभी तक शोधकर्ताओं ने यह पता लगाया था कि जो बच्चे मां का दूध पीकर बड़े होते हैं, वे बुद्धि परीक्षण में अच्छा प्रदर्शन करते हैं।
ऐसा क्यों हैं, इसका पता नहीं लगाया जा सका था। लेकिन अब ताजा अध्ययन में समाजशास्त्रियों ने बच्चों की परवरिश में दो मुख्य बातों का जिक्र किया है, एक तो बच्चे के भावनात्मक संकेतो पर प्रतिक्रिया देना और दूसरा नौ महीने की उम्र से बच्चे को विभिन्न पठन सामग्रियां पढ़ कर सुनाना।
उताह की ब्रिंघम यंग यूनिवर्सिटी के प्रमुख अध्ययनकर्ता बेन गिब्स ने कहा कि अपने बच्चे को दुग्धपान कराने वाली महिलाएं दोनों चीजें करती हैं। यह बच्चे की परवरिश का ही नतीजा है, जो उसे दूसरों से अलग बनाता है। शोधकर्ताओं ने अध्ययन में यह भी पाया कि बच्चों के दब्बू और कमजोर होने का कारण बचपन में अनुकूल परवरिश न होना भी हो सकता है।

वायु प्रदूषण से 2012 में 70 लाख लोग मरे: WHO

संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य एजेंसी ने बताया कि वायु प्रदूषण के कारण 2012 में विश्वभर में 70 लाख लोगों की मौत हुई है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन में सार्वजनिक एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य की प्रमुख मारिया नीरा ने कहा, ‘ घर के भीतर और बाहर वायु प्रदूषण अब एक बड़ी पर्यावरणीय समस्या है और यह विकसित एवं विकासशील दोनों तरह के देशों को प्रभावित कर रही है।’ डब्ल्यूएचओ के नए अनुसंधान के अनुसार वैश्विक स्तर पर 2012 में आठ में से एक व्यक्ति की मौत प्रदूषण से जुड़ी है। प्रदूषण के कारण जो घातक बीमारियां होती हैं, उनमें हृदय संबंधी रोग, फेफड़ों संबंधी बीमारियां और फेफड़ों का कैंसर शामिल हैं।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार वैश्विक स्तर पर प्रदूषण के कारण सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में भारत और इंडोनेशिया समेत दक्षिणपूर्वी एशिया तथा चीन और दक्षिण कोरिया से लेकर जापान और फिलीपीन तक शामिल हैं।
घर के भीतर मुख्य रूप से कोयला, लकड़ी और जैव इंधन स्टोव से खाना बनाने और अन्य कारणों से हुए प्रदूषण से 43 लाख लोगों की मौत हुई है। कोयला ताप आग से लेकर डीजन इंजन तक बाह्य प्रदूषण के स्रोतों से 37 लाख लोगों की जान गई है।

भांग से पड़ सकता है पुरूषों की प्रजनन क्षमता पर असर

अपने तरह के एक बड़े अध्ययन में दावा किया गया है कि भांग का सेवन करने वाले पुरूषों की प्रजनन क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है क्योंकि इससे उनके शुक्राणुओं का आकार प्रभावित होता है।
शैफील्ड और मैनचेस्टर विश्वविद्यालयों के एक अनुसंधान दल ने यह पता लगाने की कोशिश की कि जीवनशैली से जुड़े कारक शुक्राणुओं के आकार को किस तरह प्रभावित करते हैं। उन्होंने पाया कि गर्मी के महीनों में स्खलित वीर्य के शुक्राणुओं का आकार अच्छा नहीं था लेकिन जिन पुरूषों की यौन गतिविधि 6 दिन से अधिक समय बाद हुई उनके शुक्राणुओं का आकार बेहतर था।
धूम्रपान, मद्यपान एवं अन्य मादक पदाथरें के सेवन का भी असर शुक्राणुओं पर देखा गया। ब्रिटेन के करीब 14 प्रजनन केंद्रों में आए 2,249 लोगों से बातचीत के आधार पर किए गए इस अध्ययन के नतीजे ‘ह्यूमन रिप्रोडक्शन’ जर्नल में प्रकाशित हुए हैं।
शैफील्ड विश्वविद्यालय में एंड्रोलॉजी विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ एलन पेसी ने कहा ‘हमारे आंकड़े सुझाव देते हैं कि भांग का सेवन करने वाले अगर परिवार शुरू करने की योजना बना रहे हैं तो उनको इसका उपयोग बंद कर देना चाहिए।’ प्रयोगशाला में किए गए अध्ययन से पता चलता है कि असामान्य आकार की वजह से शुक्राणु कम असरदार हो जाते हैं। 

मछलियों का दिमाग इंसानों से भी तेज होता है!

मछलियों के बारे में आम धारणा यह है कि उनमें दिमाग नहीं होता और उन्हें दर्द महसूस नहीं होता लेकिन अब एक नए अध्ययन में पता चला है कि मछलियों का दिमाग कई मायनों में हम इंसानों से भी तेज होता है। ऑस्ट्रेलिया की मैक्वोयर युनिवर्सिटी के कुलुम ब्राउन ने एक समीक्षा में लिखा, ‘मछलियों की याददाश्त तेज होती है।यहां तक कि मछलियां खुद को और दूसरी मछलियों को बेहतर तरीके से पहचान भी सकती हैं। वे एक-दूसरे के साथ सहयोग करती हैं। अध्ययन में पता चला कि इंसानों की तरह मछलियां भी स्वविकसित उपकरणों का इस्तेमाल करने में सक्षम होती हैं। अपने शोध के लिए बोनी मछली का अध्ययन करने वाले ब्राउन ने लिखा, ‘मछलियों का व्यावहारिक और ज्ञान संबंधी सुधार और उनमें दर्द की धारणा के विषय में मिले व्यापक सबूत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि किसी भी अन्य रीढ़ वाले प्राणी की तरह ही मछलियों को भी संरक्षण दिए जाने की जरूरत है।’

जर्नल एनिमल कॉग्निशन में प्रकाशित शोध के मुताबिक मछलियों की अब तक ज्ञात 32,000 प्रजातियां अन्य रीढ़ वाले प्राणियों की तुलना में कहीं ज्यादा हैं, लेकिन इनके संरक्षण की ओर आवश्यक ध्यान नहीं दिया गया है।

तनाव से घट सकती है स्मरण क्षमता

बिना वजह के तनाव से दूर रहिए, वरना समय से पहले ही आपकी स्मरण शक्ति कमजोर हो सकती है।  शोधकर्ताओं के अनुसार, तनाव पैदा करने वाले हार्मोन का स्तर अधिक होता है, वृद्धावस्था में उनके मस्तिष्क में रचनात्मक परिवर्तन और स्मरण शक्ति में अल्पकालिक कमी दिखाई पड़ता है।

चूहों पर किए गए इस शोध में शोधकर्ताओं ने अल्पकालिक स्मृति के लिए जिम्मेदार मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स के कोशिकाओं की जांच की। गौरतलब है कि चूहों में तनाव के लिए जिम्मेदार हार्मोन 'कॉर्टिकोस्टेरॉन' मानवों में पाए जाने वाले हार्मोन 'कॉर्टिसोल' के समान ही होता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार जिन चूहों में कॉर्टिकोस्टेरॉन का स्तर अधिक था, उनके प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स की कोशिकाओं के बीच का संयोजन, अपेक्षाकृत कम कॉर्टिकोस्टेरॉन वाले चूहों से बेहद कम था। स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक रॉबर्ट सैपोस्की ने कहा, मष्तिस्क के प्रीफ्रंटल क्षेत्र में यह हार्मोन उम्र बढ़ाने वाले एक पेसमेकर की तरह काम कर सकता है।  सैपोस्की हालांकि इस शोध से जुड़े नहीं हैं। रैडली कहते हैं, अध्ययन से पता चलता है कि मष्तिस्क में इस हॉर्मोन का प्रभाव जैसा पहले समझा जाता था उससे कहीं ज्यादा पड़ता है।

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