Find Us OIn Facebook

Showing posts with label जानकारी. Show all posts
Showing posts with label जानकारी. Show all posts

Sunday, May 3, 2015

थाली में दाल-रोटी की जगह लेंगे कीड़े

आप शुद्ध शाकाहारी हैं? अगर हां, तो आपके लिए एक बुरी खबर है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने आगाह किया है कि विश्व की आबादी आठ अरब के आसपास पहुंचने की वजह से इतनी बड़ी आबादी का पेट अब सिर्फ शाकाहार से भरना मुश्किल होगा। ऐसे में जल्द लोगों के पास कीड़े-मकोड़े खाने के अलावा कोई दूजा विकल्प नहीं बचेगा।
एफएओ ने हाल में `एडिबल इनसेक्ट्स: फ्यूचर प्रोसपेक्ट्स फॉर फूड एंड फीड सिक्योरिटी` शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इस रिपोर्ट में स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिहाज से लाभकारी माने जाने वाले ऐसे कीटों की सूची बनाई गई है जिन्हें आप पूरक आहार के रूप में ले सकते हैं। ये कीड़े-मकोड़े भविष्य में कैसे आपकी भूख मिटा सकते हैं?
`मोपेन` नामक इल्ली या सूंडियां ऐसे कीटों में शामिल हैं। इन्हें खाने से पूर्व नमकीन पानी में उबाला और धूप में सुखाया जाता है। इन्हें बिना रेफ्रिजरेटर भी कुछ माह तक सुरक्षित रखा जा सकता है। एफएओ के मुताबिक, इल्लियां पोटेशियम, सोडियम, कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम, जिंक, मैगनीज और कॉपर का एक अच्छा स्रोत हैं।
पोषणयुक्त अन्य कीटों में दीमक भी शामिल हैं। इन्हें तलकर, धूप में सुखाकर, भूनकर या केले के पत्तों पर रखकर भांप लगाकर खाया जा सकता है। आमतौर पर दीमक में 38 प्रतिशत तक प्रोटीन होता है। टिड्डे भी बड़े पैमाने पर खाए जाते हैं। इन्हें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन देने के लिए जाना जाता है। बदबूदार कीड़े पूरे एशिया, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका में खाए जाते हैं। खाने से पूर्व इन्हें भूना या पानी में भिगोकर धूप में सुखाया जाता है। ये कीड़े-मकोड़े प्रोटीन, आयरन, पोटेशियम और फास्फोरस सहित कुछ अन्य महत्वपूर्ण पोषक तत्वों से समृद्ध होते हैं।

नारियल से ब्लड ग्रुप की जानकारी सिर्फ 10 सेकेंड में!

छत्तीसगढ़ के रायपुर में कृषि विभाग में कार्यरत बी. डी गुहा ने आश्चर्यजनक रूप से नारियल से ब्लड ग्रुप पहचानने की तकनीक ईजाद की है। गुहा किसी भी व्यक्ति को बिना छुए महज 10 सेकेंड में ब्लड ग्रुप बता देते हैं। आमतौर पर नारियल सिर्फ मंदिरों में फोड़ने के काम आता है लेकिन कोई कहे कि यह आपका ब्लड ग्रुप बता सकता है तो सहसा विश्वास नहीं होता। गुहा का दावा है कि वह इससे भरा और खाली सिलेंडर, जमीन के अंदर का पानी, भूमिगत सुरंगों की भी पहचान कर सकते हैं। विभिन्न ब्लड ग्रुप में नारियल अलग-अलग दिशा में क्यों मुड़ता है, इसका वैज्ञानिक कारण जानने के लिए वह अब शोध कर रहे हैं।
चिकित्सा विज्ञान के मुताबिक 8 ब्लड ग्रुप ए पॉजीटिव, ए निगेटिव, एबी पॉजीटिव, एबी निगेटिव, बी पॉजीटिव, बी निगेटिव, ओ पॉजीटिव और ओ निगेटिव होते हैं।
गुहा बताते हैं कि इनमें से 5 ब्लड ग्रुप. ए पॉजीटिव, एबी पॉजीटिव, बी पॉजीटिव, ओ पॉजीटिव और ओ निगेटिव को वह नारियल से पहचान सकते हैं। बाकी तीन को लेकर भी शोध हो रहा है। चूंकि ये तीनों ब्लड ग्रुप वाले लोगों की संख्या बहुत कम हैं, इसलिए इन्हें पहचानने में समय लग रहा है।
आखिर अलग-अलग ब्लड ग्रुप में नारियल अलग दिशा में क्यों मुड़ जाता है, इसका वैज्ञानिक कारण गुहा खुद नहीं जानते। गुहा इसे पता लगाने के लिए अब शोध कर रहे हैं। इस काम में उनकी मदद कर रही हैं उनकी बेटी सोनाली, मोनाली और बेटा आयुष।
कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग कर रहे उनके तीनों बच्चों को जल्द ही इससे संबंधित वैज्ञानिक कारण पता लगने की उम्मीद है। पत्नी मीनाक्षी भी अब इस कला में विशेषज्ञ हो चुकी हैं।
गुहा बताते हैं कि किसी भी व्यक्ति के सिर से थोड़ा ऊपर हथेली में नारियल लें। थोड़ी देर में नारियल अलग दिशा में मुड़ जाता है। जिस जगह भूमिगत पानी, या जल आपूर्ति की पाइपलाइन हो, वहां नारियल सही नतीजे नहीं बताता।
ए पॉजीटिव ब्लड ग्रुप होने पर नारियल 45 डिग्री की पोजिशन लेता है। एबी पॉजीटिव में 45 से 55 डिग्री, बी पॉजीटिव में 60 डिग्री, ओ पॉजीटिव में 90 और ओ नेगेटिव में 180 डिग्री की पोजीशन ले लेता है।
गुहा ने बताया कि साल 2005 में बलौदाबाजार के एक स्कूल में पानी के अच्छे स्रोत का पता लगाने के लिए मुझे बुलाया गया था। वहां के बच्चे बहुत शरारत कर रहे थे, उन्हें शांत कराने के लिए मैंने उनसे कहा कि तुम सब एक लाइन में खड़े हो जाओ, मैं जांचूंगा कि तुममें पानी है या नहीं।
मजाक-मजाक में किए गए इस परीक्षण के दौरान मैंने देखा कि कुछ बच्चों के सिर से थोड़ा ऊपर हथेली पर रखा नारियल 90 डिग्री में खड़ा हो गया। मैंने यही प्रयोग घर आकर अपने बच्चों पर किया। फिर, वही हुआ। लैब में बच्चों का ब्लड ग्रुप चेक कराया तो वो ओ पॉजीटिव निकला। बस यहीं से मेरा ये सफर शुरू हो गया। बहरहाल राजधानी का यह गुहा परिवार शोध के बाद कुछ और नई जानकारियां सामने लाने में जुटा हुआ है।

मां का दूध पीने वाले बच्चे पढ़ाई में अच्छे

जो बच्चे मां का दूध पीते हैं, वे ज्यादा तेज दिमाग होते हैं। मां के दूध में कोई ऐसा छुपा गुण होता है, जिससे बच्चे कुशाग्र हो जाते हैं। मां का दूध बच्चे के लिए सबसे पौष्टिक भोजन होता है यह बात तो हमें पता है लेकिन मां के दूध में छुपे गुणों के कारण उनके कुशाग्र होने की बात एक ताजातरीन अध्ययन में कही गई है। अध्ययन के मुताबिक ऐसे बच्चे स्कूल में आमतौर पर दूसरों की तुलना में अच्छा प्रदर्शन करते हैं।
अभी तक शोधकर्ताओं ने यह पता लगाया था कि जो बच्चे मां का दूध पीकर बड़े होते हैं, वे बुद्धि परीक्षण में अच्छा प्रदर्शन करते हैं।
ऐसा क्यों हैं, इसका पता नहीं लगाया जा सका था। लेकिन अब ताजा अध्ययन में समाजशास्त्रियों ने बच्चों की परवरिश में दो मुख्य बातों का जिक्र किया है, एक तो बच्चे के भावनात्मक संकेतो पर प्रतिक्रिया देना और दूसरा नौ महीने की उम्र से बच्चे को विभिन्न पठन सामग्रियां पढ़ कर सुनाना।
उताह की ब्रिंघम यंग यूनिवर्सिटी के प्रमुख अध्ययनकर्ता बेन गिब्स ने कहा कि अपने बच्चे को दुग्धपान कराने वाली महिलाएं दोनों चीजें करती हैं। यह बच्चे की परवरिश का ही नतीजा है, जो उसे दूसरों से अलग बनाता है। शोधकर्ताओं ने अध्ययन में यह भी पाया कि बच्चों के दब्बू और कमजोर होने का कारण बचपन में अनुकूल परवरिश न होना भी हो सकता है।

वायु प्रदूषण से 2012 में 70 लाख लोग मरे: WHO

संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य एजेंसी ने बताया कि वायु प्रदूषण के कारण 2012 में विश्वभर में 70 लाख लोगों की मौत हुई है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन में सार्वजनिक एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य की प्रमुख मारिया नीरा ने कहा, ‘ घर के भीतर और बाहर वायु प्रदूषण अब एक बड़ी पर्यावरणीय समस्या है और यह विकसित एवं विकासशील दोनों तरह के देशों को प्रभावित कर रही है।’ डब्ल्यूएचओ के नए अनुसंधान के अनुसार वैश्विक स्तर पर 2012 में आठ में से एक व्यक्ति की मौत प्रदूषण से जुड़ी है। प्रदूषण के कारण जो घातक बीमारियां होती हैं, उनमें हृदय संबंधी रोग, फेफड़ों संबंधी बीमारियां और फेफड़ों का कैंसर शामिल हैं।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार वैश्विक स्तर पर प्रदूषण के कारण सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में भारत और इंडोनेशिया समेत दक्षिणपूर्वी एशिया तथा चीन और दक्षिण कोरिया से लेकर जापान और फिलीपीन तक शामिल हैं।
घर के भीतर मुख्य रूप से कोयला, लकड़ी और जैव इंधन स्टोव से खाना बनाने और अन्य कारणों से हुए प्रदूषण से 43 लाख लोगों की मौत हुई है। कोयला ताप आग से लेकर डीजन इंजन तक बाह्य प्रदूषण के स्रोतों से 37 लाख लोगों की जान गई है।

भांग से पड़ सकता है पुरूषों की प्रजनन क्षमता पर असर

अपने तरह के एक बड़े अध्ययन में दावा किया गया है कि भांग का सेवन करने वाले पुरूषों की प्रजनन क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है क्योंकि इससे उनके शुक्राणुओं का आकार प्रभावित होता है।
शैफील्ड और मैनचेस्टर विश्वविद्यालयों के एक अनुसंधान दल ने यह पता लगाने की कोशिश की कि जीवनशैली से जुड़े कारक शुक्राणुओं के आकार को किस तरह प्रभावित करते हैं। उन्होंने पाया कि गर्मी के महीनों में स्खलित वीर्य के शुक्राणुओं का आकार अच्छा नहीं था लेकिन जिन पुरूषों की यौन गतिविधि 6 दिन से अधिक समय बाद हुई उनके शुक्राणुओं का आकार बेहतर था।
धूम्रपान, मद्यपान एवं अन्य मादक पदाथरें के सेवन का भी असर शुक्राणुओं पर देखा गया। ब्रिटेन के करीब 14 प्रजनन केंद्रों में आए 2,249 लोगों से बातचीत के आधार पर किए गए इस अध्ययन के नतीजे ‘ह्यूमन रिप्रोडक्शन’ जर्नल में प्रकाशित हुए हैं।
शैफील्ड विश्वविद्यालय में एंड्रोलॉजी विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ एलन पेसी ने कहा ‘हमारे आंकड़े सुझाव देते हैं कि भांग का सेवन करने वाले अगर परिवार शुरू करने की योजना बना रहे हैं तो उनको इसका उपयोग बंद कर देना चाहिए।’ प्रयोगशाला में किए गए अध्ययन से पता चलता है कि असामान्य आकार की वजह से शुक्राणु कम असरदार हो जाते हैं। 

खतरनाक बिच्छुओं के जहर से होगा मस्तिष्क कैंसर का इलाज!

मस्तिष्क कैंसर के इलाज में बिच्छू का विष कारगर साबित होगा. क्योंकि बिच्छू के जहर से बने 'ट्यूमर पेंट' के मानव परीक्षण के लिए अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) से मंजूरी वैज्ञानिकों को मिल गई है। परीक्षण के पहले दौर में ट्यूमर पेंट का इस्तेमाल ग्लिओमा (मस्तिष्क या मेरुदंड का ट्यूमर) से पीड़ित 21 मरीजों पर होगा। इस उत्पाद का निर्माण अमेरिका की ब्लेज बायोसाइंस नाम की कंपनी ने किया है।

कैंसर कोशिकाओं की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें लेने में ट्यूमर पेंट सहायता करेगा, जिससे न सिर्फ कैंसर का बेहतर तरीके से निदान हो सकेगा, बल्कि कैंसर की संपूर्ण और बेहतर सर्जरी भी संभव हो सकेगी। ट्यूमर पेंट का विकास इजरायल के खतरनाक बिच्छुओं के जहर से किया गया है। सिएटल चिल्ड्रंस हॉस्पिटल में मस्तिष्क कैंसर के विशेषज्ञ जिम ओस्लेन ने कहा कि ब्लड-ब्रेन बैरियर के कारण किसी भी अणु को मस्तिष्क तक पहुंचाना बेहद कठिन काम है। इसी को ध्यान में रखते हुए इसके विकास के लिए बिच्छू के जहर का विचार आया। 

सावधान! फलों और सब्जियों में है 140 प्रतिशत ज्यादा कीटनाशक

कंज्यूमर यूनिटी एंड ट्रस्ट सोसायटी (कट्स) ने जैविक खाद्य पदार्थों एवं जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिये एक परिचर्चा का आयोजन किया। कट्स के निदेशक जॉर्ज चेरियन ने कहा कि फलों और सब्जियों में 140 प्रतिशत ज्यादा कीटनाशक पाये जाते है, आम लोगों को भी घरों में किचन गार्डन के माध्यम से जैविक खेती करनी चाहिए।
कृषि विभाग के अतिरिक्त निदेशक शीतल प्रसाद शर्मा ने बताया कि विभाग को जैविक खेती के लिये 125 करोड़ का सहयोग प्राप्त हुआ है। एकेएन यूनिवर्सिटी के रिसर्च निदेशक डा के रामाकृष्णा ने बताया कि जैविक खेती के लिये बहुत सारी तकनीकें अपनानी पड़ती हैं। आज बाजार में खाद्य पदार्थ उपलब्ध है उनमें अधिकतर में कीटनाशक एवं रासायनिक पदार्थों का उपयोग किया गया है।

दुनिया में 74.8 करोड़ लोगों को मिलता है गंदा पानी: WHO

जेनेवा:  दुनिया में तकरीबन 74.8 करोड़ लोगों को नियमित रूप से साफ पानी नहीं मिल रहा है और करीब 18 लाख लोगों को दूषित पानी से अपनी जरूरतें पूरी करनी पड़ रहीं हैं। यह जानकारी विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में सामने आई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 25 लाख लोग सफाई के अभाव में रह रहे हैं और 100 करोड़ लोगों को खुले में शौच जाना पड़ रहा है, वहीं ग्रामीण इलाकों में हर 10 में से नौ लोग खुले में शौच जाने के लिए मजबूर हैं।
'ग्लास-2014' के नाम से जारी की गई इस रिपोर्ट में यह प्रमुख निष्कर्ष सामने आए हैं। यह अध्ययन हर दो साल में डब्ल्यूएचओ द्वारा कराया जाता है। इस अध्ययन के 2014 संस्करण को 'जल और स्वच्छता में निवेश, असमानता को कम करने, उपयोग में वृद्धि' नाम से जारी किया गया है। अध्ययन में बताया गया है कि पिछले दो दशकों में पीने के साफ पानी तक 23 लाख लोगों की पहुंच बढ़ी है।

इसी समय चक्र में डायरिया से मरने वाले बच्चों की मौत का कारण काफी हद तक स्वच्छता से जुड़ा हुआ था। 1990 में यह संख्या 15 लाख थी जो कि 2012 में घटकर छह लाख रह गई। डब्ल्यूएचओ में सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण विभाग की निदेशक मारिया नेरा इन सुधारों की सराहना की, लेकिन उन्होंने कहा कि अभी भी यह आंकड़ा काफी बड़ा है। अध्ययन में साफ-सफाई के महत्व पर ध्यान केंद्रित करते हुए कहा गया कि 75 फीसदी धनराशि का प्रयोग लोगों को पीने का स्वच्छ पानी मुहैया कराने के लिए किया जा रहा है।

एजेंसी 

आलू को सड़ने से बचाएगी नई तकनीक!

पंजाब के दोआबा इलाके में किसानों के लिए आलू की बंपर फसल अक्सर उनके लिए नुकसान दायक रही है। किसानों को नुकसान से बचाने की दिशा में जालंधर स्थित केंद्रीय आलू शोध स्टेशन ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे आलू को न केवल सड़ने से बचाया जा सकेगा बल्कि इसे लंबे समय तक भंडारण करके भी रखा जा सकेगा।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अधीन केंद्रीय आलू शोध स्टेशन (सीपीआरएस) की तकनीक के तहत आलू को बिना खराब हुए आठ महीने तक भंडारण करके रखा जा सकता है।

इस तकनीक को विकसित करने वाले सीपीआरएस की प्रधान वैज्ञानिक डा आशिव मेहता ने इस बारे में बताया, ‘आलू में लगभग 80 फीसदी पानी की मात्रा होती है। यही कारण है कि मिट्टी से निकालने के कुछ ही हफ्ते बाद यह खराब होना शुरू हो जाता है।’ महिला वैज्ञानिक ने बताया, ‘अगर हम इस पानी को आलू से निकाल दें तो इसका जीवनकाल कुछ हफ्तों से बढ़कर आठ महीने तक हो सकता है और इतने समय तक इसे भंडारण करके भी रखा जा सकता है।’ सीपीआरएस के दो अन्य सहयोगियों के साथ इस तकनीक को विकसित करने वाली डा मेहता ने कहा, ‘हमने इस तकनीक का नाम ‘डिहाइड्रेशन आफ पोटैटो’ रखा है और यह पर्यावरण अनुकूल भी है।’

फेसबुक की तरह संपर्क साधती हैं मस्तिष्‍क की तंत्रिका कोशिकाएं

मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाएं आपस में सोशल नेटवर्क की तरह गुथी हुई हैं। एक शोध निष्कर्ष में इसका खुलासा किया गया है।

यूनिवर्सिटी ऑफ बसेल के शोधकर्ताओं का कहना है कि हर एक तंत्रिका कोशिका का संपर्क दूसरी तंत्रिका कोशिकाओं के साथ होता है, लेकिन कुछ तंत्रिका कोशिकाओं का आपस में घनिष्ठ संबंध होता है, जैसे फेसबुक पर लोगों का अपने दोस्तों के साथ होता है। विश्वविद्यालय के प्रोफेसर थॉमस मर्सिक-फ्लोगेल ने बताया कि मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं में भी एक तरह की प्रकृति वाली तंत्रिका कोशिकाओं के बीच घनिष्ठ और मजबूत संपर्क होता है, जबकि विपरीत या अलग प्रकृति वाली तंत्रिका कोशिकाओं के साथ कम या लगभग नहीं के बराबर संपर्क होता है।

शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के दौरान मस्तिष्क के सेरेबरल कॉटेक्स का विशेष रूप से अध्ययन किया, जहां आंखों द्वारा सूचना प्रेषित होती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि यह वैसा ही है, जैसा कि फेसबुक पर किसी इंसान के कई सारे दोस्त होते हैं, लेकिन किसी खास समूह के साथ ही उनका संपर्क मजबूत होता है।

चीटियों को भी लगा जंक फूड का चस्का

अगर आपको लगता है कि डिब्बाबंद खाद्य पदार्थो (जंक फूड) की दीवानी केवल युवा पीढ़ी ही है, तो आप मुगालते में हैं। शहरी परिवेश में रहने वाली चीटियों की कुछ प्रजातियां भी इस तरह के खाद्य पदार्थों की दीवानी हैं। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है।


इस निष्कर्ष से उस जिज्ञासा का उत्तर मिलता है कि चीटियों की कुछ प्रजातियां केवल शहरी परिवेश में ही ज्यादातर क्यों पाई जाती हैं। निष्कर्ष के लिए चीटियों के शरीर में आइसोटोप स्तर का अध्ययन किया गया। अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना स्टेट युनिवर्सिटी के मुख्य लेखक क्लिंट पेनिक ने कहा, 'हम इस बात का पता लगाना चाहते थे कि चीटियों की कुछ प्रजातियां क्यों हमारे आस-पास ही पाई जाती हैं, जबकि कुछ प्रजातियां इससे इतर मानवीय गतिविधियों से दूर वाले इलाकों में रहना पसंद करती हैं।'

अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 21 प्रजातियों की 100 चीटियों पर यह अध्ययन किया, जिन्हें मैनहप्तन से फुटपाथों, पार्को व अन्य जगहों से एकत्रित किया गया। उन्होंने कहा, 'शहरी प्रजाति की चीटियों के आहार वही होते हैं, जो वहां के मानवों के आहार हैं।'

मानव सहित लगभग सभी पशु अपने भोजन के रूप में कार्बन ग्रहण करते हैं। कार्बन की ही एक किस्म सी13 मक्का व गन्ने जैसी घासों से संबंधित है। चूंकि, लगभग सभी जंक फूड में मक्का तथा शर्करा मौजूद होते हैं। इसलिए सी13 उन सभी चीटियों में पाए जाते हैं, जो मानव आहार को ग्रहण करते हैं। दूसरी ओर मानव आहार ग्रहण न करने वाली चीटियों में सी13 नहीं पाया जाता।

© 2013 HEALTH TIPS . All rights resevered. Designed by Templateism